Thursday, November 1, 2007

सरकारी रामसेतु परियोजना आख़िर है क्या ?

अभी जो जहाज सिंधु सागर (अरब सागर) से दक्षिण पूर्व एशिया या आगे की यात्रा करते है, वे गंगा सागर (बंगाल की खाडी) जाने के लिए श्रीलंका का चक्कर लगाते है। यह चक्कर न लगे इसके लिए विचार किया गया कि भारत और श्रीलंका के मध्य मे जो समुन्द्र है वहाँ से जहाजो को निकाला जाये ।
सबसे पहले एक अंग्रेज़ ने वर्ष १८६० मे एक नहर के जरिये ऐसा मार्ग बनाने की योजना प्रस्तुत की थी। लगभग उसी समय यूरोप को एशिया से जोड़ने के लिए मिश्र के समुन्द्र मे स्वेज नहर बनाने की योजना भी बनी ।
भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ने वाली इस नहर पर १८५९ मे काम भी शुरू हो गया । दस सालो मे १७१ किमी लंबी यह नहर बन कर तैयार हो गई ।
इसी प्रकार उत्तर और दक्षिण अमेरिका के बीच तथा प्रशांत और अटलांटिक महासागर को जोड़ने वाली पनामा नहर (८० किमी) भी सन १९१४ मे बन गई ।

समुद्र मे नहर बनाने के जरुरत इसलिए होती है कि इससे समुद्र की गहराई जहाजो के आने जाने लायक हो जाती है ।
भारत और श्रीलंका के बीच जो नहर बनाईं जा रही है उसके लिए समुद्र तल के खुदाई की जानी है, ताकि जहाजो के आवागमन के योग्य गहराई बन सके। यह नहर बन जाने से जहाजो को ४६५ से ८३५ किमी की यात्रा कम करनी पड़ेगी तथा यात्रा मे २१ से ३६ घंटो के समय की बचत होगी।
सबसे पहले सन १९५५ मे केन्द्र सरकार ने इस योजना को मंजूरी दी , लेकिन काम शुरू नही हो सका, १९८३ तथा ९६ मे भी इस पर विचार विमर्श हुवा किन्तु काम शुरू नही हुवा ।
वर्तमान केन्द्र सरकार ने अमेरिकी दबाव मे २ जुलाई २००५ को इस १६७ किमी लंबी तथा ३०० मीटर चोडी सेतु समुद्रम परियोजना पर कार्य आरंभ किया।

"पाथेय कण " पत्रिका से साभार



No comments: